माँ शब्द की गरिमा को जानो ! माँ कोई बिकाऊ चीज नहीं होती !

माँ शब्द केवल संबोधन नहीं है, बल्कि किसी बच्चे के लिए जीवन है, किसी युवा के लिए प्रोत्साहन है, किस वृद्ध के लिए मीठी यादें हैं | हम दुःख में हों, हताश हो जाएँ कभी तो कोई याद नहीं आता, केवल माँ ही याद आती है इसलिए माँ शब्द को इन बिकाऊ चीजो के साथ मत जोड़ें | माँ शब्दों का प्रयोग उन्ही के लिए करें जो बिकाऊ न हों

Read More …

क्या मायावी देव-दानव-दैत्य आज भी होते हैं ?

पहले मायावी लोग कई कई ड्रेस बदलते थे दिन भर में, हर दिन हर त्यौहार में नए रूप में नजर आते थे | आधुनिक मायावी देव, दैत्य व दानव भी वही करते हैं | नए नए, महंगे महंगे ड्रेस पहनते हैं लेकिन फिर भी फ़कीर कहलाते हैं |

Read More …

दान, सहयोग व भीख में अंतर

भीख उसे माना जाता है जो आप किसी गरीब पर दया खाकर देते हैं लेकिन उसकी सहायतार्थ नहीं, जबकि दान करते समय आप सहयोगी भाव रखते हैं | दान बहुत ही कम लोग कर पाते हैं क्योंकि इसके लिए आपका हृदय बड़ा होना चाहिए | कंजूस और वैश्य मानसिकता के लोग दान कभी नहीं करते, वे सौदा या व्यापार ही करते हैं |

Read More …

कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था के पीछे का दर्शन क्या था ?

अक्सर शहरों में सभी अपने अपने पुराने समान कबाडियों को बेचते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे वैश्य हो गये | शादी विवाह भी आजकल व्यपारिक समझौते मात्र बन गये, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सौदेबाजी करके किये गये विवाह से दम्पत्ति बने युवा वैश्य हो गये | हाँ ये लोग परिस्थितिजन्य वैश्य अवश्य माने जा सकते हैं |

Read More …

स्वघोषित चैतन्य

इस आधार पर मैं स्वयं को स्वघोषित चैतन्य कहूँ तो आतिशयोक्ति नहीं होगी | क्योंकि मेरी चैतन्यता साधू-समाज द्वारा निर्धारित चैतन्यता या संन्यास से अलग है | मेरे संन्यास का अर्थ है जागृति | आत्मिक जागृति या उत्थान | भेड़चाल से मुक्त जीवन

Read More …