इंसान को इंसान ही रहने दें

आइन्स्टीन, मार्क ट्वेन, स्टीव जॉब्स, ओशो का कमरा और टेबल बहुत ही अस्तव्यस्त रहता था और यहाँ तक कि जुकरबर्ग का टेबल भी | लेकिन वे बाहर से चाहे कितने ही अस्तव्यस्त थे उन्होंने बहुत ही व्यवस्थित अविष्कार व दिशा निर्देश दिए |

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निराकार की पूजा सही या साकार की ?

निराकार उपासक खुद को बहुत ही एडवांस समझते हैं, बहुत ही ऊपर दर्जे वाली प्रजाति समझते हैं | लेकिन ऐसा क्यों समझते हैं, यह मेरी समझ में आज तक नहीं आया | मेरी तो छोड़िये, चुनमुन परदेसी को भी समझ में नहीं आया कभी |

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खुदा सब देख रहा है !

खुद पर कोई अन्याय हो, तब तुरंत विरोध के लिए खड़े हो जाओ क्योंकि खुदा का कोई भरोसा नहीं कब न्याय करे

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ईश्वर है या नहीं ?

एक किताब, दो किताब, हजार किताब में लिखा हो कि है, कि बेकार है…..जब तक कि भीतर से न उठे कि है, तब तक कोई उत्तर दूसरे का काम नहीं दे सकता। ईश्वर के संबंध में उधारी न चलेगी। और सब संबंध में उधारी चल सकती है, ईश्वर के संबंध में उधारी नहीं चल सकती।

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भ्रष्टाचार और कालाबाजारी मुक्त भारत

घोटाले, कालाबाजारी, हेरा-फेरी, दगाबाजी जैसे संवेदनशील व राष्ट्रहित से जुड़े कार्यों में रूचि रखने वाले गैर-राजनैतिक व्यापारियों के लिए विशेष लाइसेंस की व्यवस्था करने पर भी विचार कर रहे हैं…..

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