शिक्षा का वास्तविक अर्थ है….

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Muslim school girls from St. Maaz high school practice Chinese Wushu martial arts inside the school compound in the southern Indian city of Hyderabad. — at St. Maaz High School.

भारत में फर्स्ट डिवीज़न में पास होने वाले छात्र टेक्निकल एजुकेशन लेते हैं और डाक्टर इंजीनियर बनते हैं।

सेकंड डिवीज़न में पास होने वाले छात्र एमबीए में एडमिशन लेते हैं और एडमिनिस्ट्रेटर बनते हैं , और फर्स्ट डिवीज़न वालों को हैंडल करते हैं।

थर्ड डिवीज़न में पास होने वाले छात्र कहीं भी एडमिशन नही लेते और वे पॉलिटिशियन बनके फर्स्ट डिवीज़न और सेकण्ड डिवीज़न वालों को हैंडल करते हैं।

फ़ैल होने वाले छात्र कहीं भी एडमिशन नही लेते और अंडरवर्ल्ड में जाकर तीनों को कंट्रोल करते हैं।

और जो कभी स्कूल गए ही नही वे बाबा – साधु बनते हैं ,और ऊपर लिखे चारो उनके पैर पड़ते हैं।” -Copied

उपरोक्त विचार कई महीनों से लगातार शेयर, कॉपी-पेस्ट होते हुए देख रहा हूँ | व्यंग्य में कही गई ये बातें एक कटु सत्य है क्योंकि इसमें शिक्षा व्यवस्था की लाचारी स्पष्ट हो रही है | और साथ ही पढ़े-लिखों की कुंठा भी व्यक्त हो रही है | साधू-सन्यासियों का अपमान भी किया जा रहा है इसमें क्योंकि साधू सन्यासी इनको हरामखोर दिखाई देते हैं और खुद को ये लोग बहतु अधिक खुद्दार व मेहनती समझते हैं |

हालाँकि जो वास्तविक साधू-संत होंगे उनको इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यह विचार पूरी तरह भौतिक पदार्थों को सत्य मानने वाले समाज के लिए ही घातक है |

जो लोग शिक्षा का अर्थ डिग्री लेना मात्र ही समझते हैं उन्हें यह समझना चाहिए शिक्षा का वास्तविक अर्थ है स्वयं की शक्तियों, योग्यताओं को परखना, समझना व मानसिक-शारीरिक कमियों को दूर करके परिवार व समाज के लिए उपयोगी होना | न की शिक्षा का अर्थ रट्टा मारकर डिग्री लेना मात्र है | चूँकि शिक्षा आज विश्व का सर्वाधिक आय वाला ऐसा व्यवसाय है जिसमें कभी मंदी नहीं आती, इसलिए इसकी रूप रेखा समाज को शिक्षित करने की बजाय शोषित करने व अधिक से अधिक लूटने के उद्देश्य से रची गयी है | बच्चा घर में पैदा हुआ नहीं कि शिक्षण संस्थानों की बांछे खिल जाती हैं | नर्सरी, केजी, प्रेप….. लेकर कॉलेज और फिर प्रोफेशनल कोर्सेज़….जब तक लूट सकते हैं और जब तक सामने वाला लुटना चाहता है तब तक लूटते रहते हैं |

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यदि इसी शिक्षा को आरम्भ से ही ऐसा रखते कि व्यक्ति कॉलेज से बाहर निकलते ही आत्मनिर्भर हो जाता तो शायद समाज आज इतनी बुरी स्थिति में नहीं होता | तीन चीजें आवश्यक हैं एक व्यक्ति के लिए शिक्षा के रूप में;

सबसे पहले स्थान पर है शारीरिक सौष्ठव व आत्मरक्षा में सक्षम होना |

दूसरे स्थान पर है लेखन व पठन-पाठन में दक्षता |

तीसरा स्थान है जीविकोपार्जन के लिए उचित निर्णय लेने की क्षमता व जो भी वह चुने जीविकोपार्जन के लिए वह उसके लिए बोझ या विवशता न होकर रुचिकर हो | ये तीन महत्वपूर्ण योग्यताएं ही एक व्यक्ति को शिक्षित के रूप में परिभाषित करती हैं | और ये तीनों चीजें बच्चे को बचपन से ही स्वाभाविक रूप से स्कूलों में सिखाई जा सकती हैं और इनमें कोई मेहनत भी नहीं लगती | क्योंकि बच्चा यह सब गुण लेकर ही पैदा होता है, बस उन्हें निखारना ही होता है |

अब लोगों ने डिग्री इकट्ठी करने में अपने पच्चीस साल बर्बाद कर दिए और फिर उसके बाद बेरोजगारों की लाइन में खड़े हो गये | क्योंकि शिक्षा आत्मनिर्भरता की नहीं पर-निर्भरता की ली थी | अब कोई नौकरी देगा तब वह कुछ कर सकता है, मतलब दूसरों का मोहताज हो गया अब | अब वह एक अपाहिज की स्थिति में है | उसे जगह जगह जाकर अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी और सामने वाला उसकी योग्यता को समझेगा या नहीं या उसकी किस्मत पर निर्भर करेगा | या फिर पैसा वाला हुआ तो रिश्वत और डोनेशन देकर नौकरी पा लेगा या फिर अपने खेत बेचकर नौकरी पायेगा | और नौकरी पा भी लिया तो परिवार और सरकार का पेट भरने के लिए पैसे कमाने की मशीन बनकर रह जाता है | नुक्सान की भरपाई करने के लिए रिश्वत लेता है या फिर माफियाओं अपराधियों, भ्रष्टाचारियों की जी हुजूरी करता है |

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इन बेरोजगारों के कारण धूर्त और मक्कार नेताओं को सत्ता मिलती है क्योंकि यही लोग नेताओं के झूठ का प्रचार करते हैं बढ़ा-चढ़ाकर और चुनाव हो जाने के बाद गधे के सर के सींग की तरह गायब हो जाते हैं | धूर्त पाखंडी बाबा और साधू-संत इनका शोषण करते हैं नौकरी दिलवाने के नाम पर या किस्मत चमकाने के नाम पर |

अब आते हैं एक अनपढ़ अंगूठा छाप बाबा या संत के सामने सभी नतमस्तक हो जाते हैं तो क्यों ?

संत होना या सन्यासी होना या अध्यात्मिक गुरु होना वर्तमान शिक्षा के अंतर्गत नहीं आ सकता | क्योंकि अध्यात्म भीतरी ज्ञान है | अध्यात्म यानि आत्मा (भीतरी चेतना) का अध्ययन | कौन कैसे कब अध्यात्म को प्राप्त हो जाएगा यह कोई नहीं कह सकता | जिसने भी स्वयं को समझ लिया स्वयं को जान लिया वही अध्यात्मिक है | उसके लिए उसका डिग्रीधारी होना आवश्यक नहीं है | उसके लिए उसे किसी स्कूल में जाने, धार्मिक पुस्तकें पढ़ने या कर्मकांडों में दक्ष होने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि वह सब बाहरी समाज के लिए है, दिखाने के लिए है | आप जोर जोर से रामायण पढ़ते हैं, कुरआन पढ़ते हैं, गीता पढ़ते हैं… वह दिखावा है | आप घंटी बजाकर जोर जोर से आरती करते हैं, हवन आदि करते हैं… वह भी बाहरी आडम्बर ही है | आप मंदिरों में जाकर शाल चढाते हैं, मजारों व दरगाहों पर चादर चढाते हैं वह भी दिखावा ही है…. इन सब से भीतर की यात्रा नहीं होती | हाँ ये सब आपको आध्यात्म की ओर रुख करवाती आवश्य हैं लेकिन वास्तव में यात्रा तो स्वयं को ही करनी पड़ेगी | आप तांत्रिक विद्याएँ सीखते हैं, जादू टोना सीखते हैं यह सब यदि व्यावसायिक व ठगी के उद्देश्य से हैं तब व्यर्थ हैं यदि आत्मिक उत्थान के उद्देश्य से हैं तभी सार्थक हैं….. सारांश यह कि श्रृद्धालू लोग साधू संतों के पैर इसलिए पड़ते हैं, क्योंकि वे लोग भौतिक जगत से बाहर नहीं निकल पा रहे और एक चक्रव्यूह में फंस गए हैं | जबकि साधू संत स्वयम के केंद्र में स्थित होते हैं, इसलिए वे अध्यात्मिक और भौतिक दोनों जगत को बराबर अनुपात में समझ सकते हैं | लोग उनको भेंट देते हैं तो यह एक प्रकार का उर्जा का आदान प्रदान ही होता है | धन भी एक उर्जा है और अध्यात्मिक ज्ञान भी एक उर्जा है | यदि किसी को किसी साधू-संत के किसी विचार से कोई शांति मिलती है या कोई समस्या सुलझती है तो वह अपनी श्रृद्धानुसार कुछ न कुछ भेंट करता है यह एक प्रकार उर्जा का परस्पर विनिमय हुआ | लेकिन यदि साधू संत किसी काम के बदले में फीस तय कर दे तो फिर वह व्यवसाय हो गया |

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अब मैं कई विषयों पर लेख लिखता हूँ किसी से किसी को मार्गदर्शन मिलता है तो किसी को ज्ञान की प्राप्ति होती है कि विशुद्ध चैतन्य एक पाखंडी है और वह अब तक एक पाखंडी के लेख पढ़ रहा था…. तो दोनों ही स्थिति में मेरे लेख प्रभावी हैं और लोगों को लाभ पहुँचाते हैं | आप में से कई होंगे जिनको इस लेख से भी लाभ मिलेगा | कुछ को यह लेख सार्थक लगेगा और कुछ को बकवास और टाइम वेस्ट लगेगा | तो जिनको यह पोस्ट टाइम वेस्ट लगा उनको ज्ञान प्राप्त हुआ कि समय कितना मूल्यवान है | ~विशुद्ध चैतन्य

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