संन्यास एक अवस्था है कोई परम्परा नहीं

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अक्सर लोगों को कहते सुनत हूँ कि भगवा डाल लेने से कोई संन्यासी नहीं हो जाता | वास्तव में नकाब किसी भी डाल ले कोई वही नहीं हो जाता जिसका नकाब डाल रखा है | फिर चाहे वह आईएसएस अधिकारी का नकाब हो या फिर फिर आइपीएस अधिकारी का, फिर वह मुख्यमंत्री का नकाब हो या प्रधानमंत्री का |

फिर संन्यास कोई पद या परम्परा नहीं है, बल्कि एक स्थिति है एक अवस्था है | संन्यासी होना कोई आसान काम नहीं होता क्योंकि यह कोई नकल करने की चीज नहीं है और न ही कोई परम्परा है जिसे ढोना है मन मारकर | संन्यास बाह्य जगत से स्वयं को अलग करके स्वयं को समझने व जानने का प्रयोग है और यह प्रयोग आजीवन अनवरत चलते रहता है | व्यक्ति गृहस्थ रहते हुए भी संन्यासी हो सकता है यदि वह आसक्ति से मुक्त है |

यह माना जाता है कि संन्यासी को त्यागी होना चाहिए | लेकिन त्याग का अर्थ गलत लगा लिया सबने | संन्यासी भौतिक संसाधनों का त्यागी नहीं होता, और न ही सुख व समृद्धि का त्यागी होता है | संन्यास वास्तव में लोभ, आवश्यकता से अधिक के संचय की मनोवृत्ति, दूसरों की सम्पत्ति या वस्तु के प्रति आसक्ति, अति से विरक्ति है |

अधिकांश मानव में अधिक से अधिक पाने की इच्छा रहती है | जो है उससे अधिक पाने की इच्छा हमेशा बलवती रहती है, उस अधिक पाने की इच्छा से मुक्त होना संन्यास है | संन्यास वह स्थिति है जब व्यक्ति जल की तरह निर्मल व सरल हो जाता है | लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह दूसरों को यह अधिकार दे देता है कि उसपर किसी भी प्रकार का अत्याचार या अन्याय करे | संन्यासी होने का अर्थ गौतम बुद्ध या महावीर की तरह गालियाँ या अत्याचार सहने के लिए विवश हो जाए | संन्यासी होने का अर्थ है कि अनावश्यक उत्पात से स्वयं की रक्षा करना |

संन्यासी अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध होता है

गौतम बुद्ध के शिष्य बोधिधर्म ने जब देखा कि भारत में बुद्ध की अहिंसात्मक नीति आत्मघाती सिद्ध हो रही है और उनपर ब्राह्मणों ने अत्याचार की पराकाष्ठा कर दी है, तब उन्होंने आत्मरक्षा की शैली को अपनाया और गौतम बुद्ध के आदेश पर चीन निकल गये | वहां जाकर उन्होंने शाओलिन टेम्पल की स्थापना की | जहाँ राजा व सामंतों के अत्याचार से प्रजा को आत्मारक्षा करने की विद्या सिखाई |

मार्शल आर्ट यानि युद्ध कला वह विद्या है, जिससे व्यक्ति न केवल आत्मरक्षा में निपुण हो जाता है, बल्कि स्वयं को मानसिक रूप से संतुलित व किसी भी परिस्थिति में अपना धैर्य न खोने की कला सीखता है | वह यह भी सीखता है कि अनावश्यक रूप से अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं करना है | मार्शल आर्टिस्ट कोई तमाशा दिखाने वाला कालाबाज नहीं होता, बल्कि वह केवल दुष्टों के विरुद्ध ही अपनी शक्ति का प्रयोग करता है |

आपने मधुमक्खी तो देखी ही होगी और ततैया भी देखा होगा | ये दोनों ही बहुत घातक होते हैं और समूह में हो हो जाएँ तो प्राणघातक हो जाते हैं | लेकिन ये कभी भी आप पर अकारण आक्रमण नहीं करेंगे | मेरे अपने आश्रम में बहुत छत्ते हैं मधुमक्खियों और ततैयों के लेकिन आज तक इन्होने किसी पर अपना बल प्रयोग नहीं किया अकारण | ये तभी आक्रमण करते हैं जब कोई इनके छत्ते को क्षति पहुंचाता है | और यही है सनातम धर्म

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सनातन धर्म एक स्थिरता है, संतुलन है

मैं जब ही स्वयं को सनातन धर्मी कहता हूँ, तो लोग समझते हैं मैं किसी मजहब या रिलिजन की बात कर रहा हूँ | अधिकांश मुस्लिम तो तुरंत अपने मजहब से तुलना शुरू कर देते हैं कि हमारे मजहब से तुम्हारा सनातन धर्म श्रेष्ठ कैसे ?

बिना वजह की बहस में पड़ जाते हैं और फिर कहते हैं हमारी क़ुरान पढ़ो हमारी हदीस पढ़ो सनातन धर्म छोड़कर मुसलमान हो जाओगे यह पक्का है | क्योंकि हमारा मजहब ही जो सबसे बेहतर है | कई लोगो कहते हैं कि परिभाषित करो सनातन धर्म को और जब परिभाषा दी जाती है, तो तुरंत कहते हैं कि हमारे धर्म की किताब में भी ऐसा ही लिखा है तो हमारे धर्म से बेहतर कैसे हुआ ?

तो उन सभी से कहना चाहता हूँ कि सनातन धर्म केवल धर्म है कोई मजहब नहीं | इसकी कोई किताब नहीं क्योंकि ईश्वर ने सनातन धर्म की कोई किताब नहीं लिखी | बल्कि सभी प्राणियों के मस्तिष्क में सनातन धर्म का सम्पूर्ण ज्ञान पहले ही फीड कर देता है | जो व्यक्ति स्वयं के भीतर झाँकने की योग्यता पाता है वह सनातन धर्म को बहुत ही सहजता से समझ जाता है | लेकिन जो बाहरी दुनिया में उलझा रहता है वह सनातन धर्म से विमुख हो जाता है |

सभी धर्मों की पुस्तकों में जो शिक्षा है उसमें आंशिक शिक्षा सनातन धर्म की ही होती है | जैसे किसी कमजोर पर अत्याचार मत करो, किसी गरीब को मत सताओ, सभी से प्रेम व सद्भाव रखो, न अत्याचार सहो और न ही किसी पर होने दो | यदि कोई किसी पर अत्याचार कर रहा हो, तो तुरंत अत्याचारी के विरुद्ध खड़े हो जाओ | अपने पड़ोसी पर कभी कोई विपदा न आने दो, बल्कि हर संभव सहयोग करो......ये सब शिक्षा बिना कोई धार्मिक ग्रन्थ पढ़े पशु-पक्षी व आदिवासी भी जानते हैं और व्यव्हार में लाते हैं | इसीलिए ये लोग धार्मिकों से अधिक सुखी रहते हैं |

लेकिन स्वयं को सभ्य व धार्मिक कहने वाले समाज में देखने मिलता है कि सबसे अधिक दुखी व पीड़ित लोग हैं | अक्सर पढ़ने को मिल जाता है कि कहीं कोई भूख से मर गया, कहीं पुलिस अधिकारी ही किसी पर अत्याचार कर रहे हैं और समाज खड़ा होकर तमाशा देख रहा है....यह सब पढ़े लिखे किताबी धार्मिकों के समाज में ही देखने को मिलता है आदिवासियों के समाज में नहीं | लेकिन जो आदिवसियों का समाज शहरियों की संगत में आ गया, उनके समाज में भी वही सब देखने मिल जाता है |

यानी स्वार्थियों का समाज है पढ़े-लिखों और किताबी धार्मिकों का समाज | इनके समाज में किताबी बातें केवल किताबी ही होतीं हैं व्यावहारिक नहीं |

इसीलिए सनातन धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि यह धर्म किसी एक समुदाय या संस्कृति या देश से नहीं जुड़ा है, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में लागु है | सभी ग्रह-नक्षत्र बिना किसी के मार्ग में बाधा बने अपनी अपनी निश्चित कक्षा में चक्कर लगाते हैं यह है सनातन धर्म | सभी ग्रह-नक्षत्र परस्पर गुरुत्वाकर्षण से बंधे रहते हैं यह है सनातन धर्म | यानि हम सभी एक दूसरे से बंधे हुए हैं, सभी आपस में सहयोगी हैं |

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लेकिन जब किताबी मजहब या धर्म हावी हो जाता है, तब फिर दूरियां बढ़ने लगतीं हैं | तब कोई हिन्दू हो जाता है कोई मुस्लमान हो जाता है | तब कोई ब्राह्मण हो जाता है कोई दलित हो जाता है | और ये सभी केवल दूसरे समुदाय के विरुद्ध खड़ा कबीला मात्र बनकर रह जाता है | इनमें इतनी भी क्षमता नहीं होती कि ये अपने ही समुदाय या समाज का उत्थान कर पायें | इनमें इतनी भी क्षमता नहीं होती कि ये अपने ही समाज के शोषित व पीड़ित वर्ग की सहायता कर पायें | लेकिन धार्मिक उन्माद या दंगा-फसाद करना हो तो इनके पास धार्मिकों की फ़ौज खड़ी हो जाती है | दिन भर दूसरे मजहब या रिलिजन को कोसते रहेंगे, धर्मपरिवर्तन करवाते रहेंगे, लेकिन भला नहीं कर पाएंगे अपने ही मजहब या रिलिजन के लोगों का | उसके लिए भी सरकार या भगवान् भरोसे बैठे रहेंगे |

बैंक में कैश न होने से निराश वृद्धा

लेकिन सनातन धर्मी जहाँ भी होगा वह पीड़ित शोषितों के हितों के लिए चिंतित होगा | जो भी उससे सहायता मांगने आएगा, उसकी सहायता के लिए तत्पर रहेगा बिना व्यक्तिगत स्वार्थों को बीच में लाये यदि उसके लिए संभव हुआ | सहायता करने का अर्थ यह नहीं होता कि भीख या लंगर बाँटते फिरो | सहायता का अर्थ यह होता है कि किसी विपदा में हो कोई, उसे उस विपदा से बाहर निकलने में सहायता करना | यदि कोई प्रशासनिक अधिकारी या गुंडे मवाली किसी को अकारण परेशान कर रहे हैं तो उसकी यथा संभव सहायता करना |

लेकिन दुर्भाग्य से भारत में सनातन धर्म को समझने व व्यव्हार में लाने वाले बहुत ही कम हैं | अधिकांश तो 'मैं सुखी तो जग सुखी के सिद्धांत पर जीने वाले लोग ही मिलेंगे | यहाँ सनातन धर्मी बहुत ही कम मिलेंगे, अधिकांश हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, कांग्रेसी, भाजपाई, दलित ब्राह्मण ही मिलेंगे | या फिर वे लोग मिलेंगे जो किसी पैगम्बर, किसी किताब, किसी अवतार की नकल करने में लगे हुए हैं | उनके गुणों को तो अपनाएंगे नहीं, बल्कि उनकी तरह के कपडे, दाढ़ी मूँछ रखकर, उनकी स्तुति वंदन करके इस भ्रम में जियेंगे कि उन्होंने उनकी शिक्षा को ग्रहण कर लिया | वास्तव में वे जिनके भी अनुयाई बने फिरते हैं, उनका अंश मात्र भी अपने आचरण में नहीं ला पाते | लेकिन ढोंग करते हैं धार्मिक होने का |

अत्याचार व अन्याय के विरुद्ध होना सनातन धर्म है

अन्याय कोई भी करे, अत्याचार कोई भी करे उसके विरुद्ध होना ही सनातन धर्म है | जो अन्यायी व अत्याचारियों के समर्थन में होता है, वह अधर्मी है | जो दूसरों पर अत्याचार करता है, जो दूसरों को चैन से नहीं जीने देना वह अत्याचारी है अधर्मी है और उसके विरुद्ध होना सनातन धर्म है | अन्यायी यदि राजा भी हो तो उसका विरोध करना है और ईश्वर भी हो तो उसका विरोध करना है यही सनातन धर्म है |

लेकिन लोग अन्यायी व अत्याचारियों के विरुद्ध भी धर्म व जाति देखकर होते हैं | अपनी जाति, पार्टी का हुआ तो आँखें मूँद लेंगे, लेकिन दूसरी जाति या पार्टी का निकला तो गला फाड़-फाड़ कर चीखने चिल्लाने लगेंगे | जबकि सनातन धर्मी जाति या मजहब या राजनैतिक पार्टी देखकर विरोध नहीं करता, वह केवल अधर्म, अन्याय व अत्याचार का विरोध करता है अपने सामर्थ्यानुसार |

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नीचे एक फिल्म दे रहा हूँ, वह देखिये | समझ में आ जायेगा कि सनातन धर्म क्या है | बुद्ध ने कोई अलग पंथ या मजहब की स्थापना नहीं की थी, केवल सनातन धर्म को ही समझाने का प्रयत्न किया था | लेकिन उनके शिष्य बोधिधर्म ने खुद प्रताड़ित करने का अधिकार दिए जाने को भी हिंसा ही माना | उसने अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च के सिद्धांत को अपनाया और वही उसने चीन में सभी सिखाया |

कई लोग धर्म हिंसा का अर्थ लगाते हैं कि दूसरे मजहब के लोगों पर हिंसा करना | जबकि पंथ या मजहब के विरुद्ध होना ही सनातन धर्म के अनुसार अधर्म है | सनातन धर्म यह मानता है कि प्रयेक व्यक्ति को अपने तौर तरीके से जीने का अधिकार ईश्वर से ही प्राप्त है | इसीलिए मधुमक्खियों ढेरों छत्ते हैं यहाँ, फिर भी वे हमें परेशान नहीं करते | वे अपनी दुनिया में मस्त में मस्त हैं और हम अपनी | यहाँ नल से पानी पीने मधुमक्खियाँ आतीं हैं, लेकिन आप भी उसी नल से पानी लेंगे तो वे आपसे कुछ नहीं कहेंगी | चाहे वे कितनी ही बड़ी संख्या में बैठी हों वहां | आप उन्हें हाथ से हटा सकते हैं वे नाराज नहीं होंगी क्योंकि वे सनातन धर्मी हैं | लेकिन इन्सान कभी कुँए से किसी को पानी नहीं पीने देता, तो कभी हेंडपम्प पर चेन बाँध देता है ताकि निम्न जाति के लोग पानी न पी सकें | कभी नीची जाति का कोई दूल्हा घोड़ी पर चढ़ जाए तो सवर्णों की पूरी जाति ही खतरे में पड़ जाती है |

तो सनातन धर्म कोई जाति या मजहब नहीं है और न ही कोई किताबी पंथ या मान्यता | यह वह नियम है जो प्राकृतिक है, सम्पूर्ण जीवों में विद्यमान है समस्त ब्रह्माण्ड में व्यापत है और सभी उसी का अनुसरण करते हैं, जब तक किताबी धार्मिक या रट्टा-मार विद्वान या पढ़े-लिखे नहीं हो जाते |

जिस प्रकार सनातन धर्म प्राकृतिक नियम है ठीक इसी प्रकार संन्यास भी आत्म जागृति का प्राकृतिक नियम है | यह और बात है कि संन्यास के नाम पर लोगों ने परम्परा, कर्मकांड व पाखंड शुरू कर लिया | लेकिन संन्यास स्वयं कोई पाखंड नहीं है और न ही संन्यासी पाखंडी होता है | वह वही होता है जो वह है | यदि वह दुखी है तो दुखी होगा और यदि वह सुखी है तो सुखी ही होगा | यदि उसे क्रोध है किसी से या किसी बात पर तो वह भी नहीं छुपायेगा और यदि किसी से प्रेम है तो भी नहीं छुपायेगा | संन्यासी केवल अधर्मियों, अन्यायियों, अत्याचारियों, परपीड़कों, शोषकों का ही घोर विरोधी होता है और उन्ही से परेहज करता है | संन्यासी किसी भी पंथ या मजहब के अंतर्गत हो सकता है लेकिन वह किसी दड़बे में कैद नहीं होता और न ही किसी दड़बे के ठेकेदार को यह अधिकार देता है कि वह उसपर अपनी हुकुमत चलाये | संन्यासी पर केवल ईश्वर का ही अधिकार होता है और उसी के दिशानिर्देश पर वह चलता है |

~विशुद्ध चैतन्य




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