जब भी किसी को स्वीकारो तो सम्पूर्णता में स्वीकारो, टुकड़ों में नहीं

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मेरा एक पोस्ट (“मुझे गर्व है कि मेरे भोजन में किसी की भी चीख़ पुकार शामिल नहीं है !”) बहुत शेयर हो रहा है शाकाहारियों द्वारा | कई लोग मुझे बहुत महान समझने लगे होंगे पोस्ट की हेडलाइन देखकर… लेकिन जैसे ही उन्हें कहता हूँ कि पोस्ट भी पढ़ लो… तो पोस्ट पढ़ने के बाद उन्हें गहरा सदमा लगता है और पता चलता है कि वे विशुद्ध चैतन्य को कितना भला मानते थे, लेकिन वह तो पाखंडी निकला |

तो बाहरी दिखावों पर न जाएँ अपनी अक्ल लगायें | हर कोई अपनी शक्ल में मास्क लगाए घूम रहा है और कई लोग तो ऐसे भी हैं जो यह भी भूल गये होंगे कि उनकी अपनी असली शक्ल क्या है |

मेरे साथ ऐसा नहीं है | मैं अपनी असली शक्ल में ही रहता हूँ और मास्क लगाना कई वर्ष पहले ही छोड़ दिया था | क्योंकि मास्क लगाने पर नकली लोग ही मिलते हैं असली लोग नहीं |

इसलिए अपनी असली शक्ल में रहिये…जो कल आपको छोड़ने वाले थे, वे आज छोड़ दें वह बेहतर है, बनिस्बत कल छोड़ें यह कहकर कि हमने आपको क्या समझा था और आप क्या निकले |

एक दिन ओशो का एक प्रशंसक ओशो के पास आया और बोला कि आप वास्तव में महान हैं, आपके जैसा ज्ञानी, विद्वान्… और कोई नहीं | ओशो ने पूछा कि ऐसी कोई ख़ास बात जो आपने मुझमें देखी और जिसके वजह से आप मेरे प्रशंसक बने वह बताइये | बहुत विचार करने के बाद उस प्रशंसक ने कहा कि आप शराब नहीं पीते यह सबसे बड़ी बात है | ओशो ने कहा कि बस इतनी सी बात ??? ठीक है बाहर जा और एक बोतल शराब खरीद ला | तेरे सामने ही बैठकर पीता हूँ | उस प्रशंसक के आँखों के सामने अँधेरा छा गया, ले देकर एक सबसे बड़ी चीज खोजी थी, वह भी नकली निकली | उसके लिए ओशो की महानता केवल दारु नहीं पीने की वजह से थी… इसलिए ओशो उसे भी तोड़ देना चाहते थे |

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जब भी किसी को स्वीकारो तो सम्पूर्णता में स्वीकारो, टुकड़ों में नहीं | किसी भी पशु, पक्षी या इंसान को टुकड़ों में वही पसंद करता है, जिसकी रूचि जीव में नहीं, माँस में रूचि होती है | किसी को जिगर पसंद है, किसी को मगज, किसी को कलेजी…… और टुकड़ों में जो आपको पसंद करता है, वह कभी भी आपके दिल के टुकड़े-टुकड़े कर सकता है | क्योंकि वह मतलबी है वह आपके बहाने स्वयं को महत्व दे रहा है, वह आपकी इच्छा के विरुद्ध ही आप पर अपनी मर्जी थोप रहा है | और यदि ऐसे टुकड़ों में बंटे मानसिकता के लोगों के सामाजिक नियम को धर्म मान लें तो यह अधर्म है | न तो व्यक्ति आधा अधुरा, टुकड़ों में किसी को मिलता है, न ही धर्म और न ही प्रकृति | जो टुकड़ों में मिलता है वह है परम्परा, किताबी ज्ञान, मान्यताएँ…. क्योंकि ये सभी संकलन हैं उन विचारों मान्यताओं का जो संकलनकर्ता को अच्छी लगीं | यह संकलनकर्ता पर निर्भर करता है कि उसे क्या अच्छी लगी और क्या बुरी… जो उसे अच्छी लगी वह ईश्वरीय आदेश हो गया और जो बुरी लगी उसे शैतान की इच्छा कह दिया | जिसे उसने महत्व दिया उसे पुण्य कह दिया, जिसे महत्व नहीं दिया उसे पाप कह दिया |

इसलिए आप पाएंगे कि सनातन धर्म, प्रेम और माँ तीनों ही जब भी किसी को अपनाते हैं, तब सम्पूर्णता से ही अपनाते हैं | हम सूरज, वर्षा, आँधी को नहीं बदलते, स्वयं के लिए अनुकूल वातावरण बना लेते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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