सनातन धर्म और किताबी धर्मों (Religions) में अंतर

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बौद्ध धर्म: कोई तुम्हें पत्थर मारे, गालियाँ दे सर झुकाकर सह लो और धन्यवाद कहकर आगे निकल जाओ ।

जापानियों ने विश्वयुद्ध में, चीनियों ने अपने ही देश के छात्रों पर और बर्मा ने मुसलमानों को धन्यवाद दिया और वे मारे गए या अपने देश से पलायन करने को विवश हुए ।

ईसाई धर्म: कोई तुम्हारे एक गाल में थप्पड़ मारे दूसरा गाल आगे कर दो ।

ईसाइयों ने वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर गिरने पर दूसरा बनाने से पहले इराक और अफ़ग़ानितान को ध्वस्त कर दिया ।

इस्लाम धर्म: कोई तुम्हारे ऊपर रोज कचरा फेंके लेकिन किसी दिन न फेंके तो उसका हालचाल पूछने घर चले जाओ ।

इस्लामिक लोग कचरा फेंकने वाले यानी ईशनिंदा करने वालों को ज़िंदा जला देते हैं ।

वैदिक हिन्दू धर्म: सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुम्बकम का सिद्धांत ।

सर्वधर्म समभाव रखने वाले वैदिक हिन्दू मूर्ति पूजकों को कोसते रहते हैं, मांसाहारियों को कोसते रहते हैं, गौरक्षा के नाम पर गरीब कमजोरों की हत्याएं करते हैं ।

उपरोक्त कुछ वे सिद्धांत थे जिनका बहुत प्रचार प्रसार किया जाता है धर्मों के ठेकेदारों द्वारा | ताकि यह बताया जा सके कि उनका धर्म कितना महान है, कितना मानवीय है | सभी धर्मों के अनुयाई अपने अपने धर्मों के संस्थापकों के विषय में लगभग एक ही सी कहानी सुनाते हैं | किसी को गालियाँ और पत्थर पड़ते थे तो वह सर झुकाकर सह लेता था और फिर धन्यवाद कहकर आगे बढ़ जाता है | किसी के सर पर कूड़ा कचरा फेंका जाता था तो वह बुरा नहीं मानता, उलटे जिस दिन कूड़ा न फेंका जाये उस दिन हाल चाल पूछने पहुँच जाता था | किसी को क्रूस पर लटका दिया गया तो उसने कहा कि “हे ईश्वर इन्हें माफ़ कर देना, ये नहीं जानते ये लोग क्या कर रहे हैं” |

लेकिन व्यावहारिक जगत में हम देखें तो सभी अनुयाई अपने ही आदर्शों के विरुद्ध आचरण करते दिखाई देते हैं | सारा काम उनके अपने ही धर्म ग्रंथों पर लिखे शिक्षाओं के विरुद्ध करते हैं | लेकिन जब कोई उनपर कटाक्ष करता है, तब तुरंत एक स्वर में सभी कहने लगते हैं कि हमारी आसमानी या ईश्वरीय किताबें पढ़ो, समझ में आ जायेगा कि हम और हमारा धर्म कितना महान है | कहीं कोई ईशनिंदा के नाम पर हत्याएं करता फिर रहा है तो कोई धर्म की रक्षा के नाम पर स्कूलों, मदरसों, मंदिरों, सार्वजनिक स्थलों पर विस्फोट करके मौत से अनजान लोगों की हत्याएं करता फिर रहा है | कहीं भीड़ खुद ही इन्साफ करने निकल पड़ती है किसी गरीब निर्दोष को बिना कोई सबूत के जान से मारकर, तो कहीं सार्वजनिक संपत्तियों को क्षति पहुँचाते हैं भावनाओं के आहत होने का बहाना लेकर | इन्हें कुछ कहो तो कहेंगे हमारी किताबें पढ़ लो, उसमें कितनी महान बातें लिखीं हैं इसलिए हम लोग महान हैं |

फिर दुनिया के जितनी भी आसमानी, खुदाई, मजहबी या धार्मिक किताबें हैं, सभी के साथ समस्याएँ यह है कि सभी को समझने के लिए उसके विद्वानों की आवश्यकता होती है | कोई खुद पढ़कर समझ नहीं सकता | यदि आपने खुद पढ़कर कोई अर्थ ले लिया, तो कहा जायेगा कि आपने गलत समझा | फिर हर विद्वान एक ही किताब से अलग अलग अर्थ निकालता है और इस प्रकार कोई भी नहीं समझ पाता कि सही अर्थ क्या है |

कहीं कहा जाता है कि हमारा धर्म सेक्युलर है, सभी के साथ प्रेमभाव से रहना सिखाता है, लेकिन उन्हीं के समाज में फिरके, जातियों के आधार पर भेदभाव हो रहा होता है | फिर कहा जाता है कि वह इसलिए हो रहा है क्योंकि लोगों ने आसमानी किताबों को नहीं पढ़ा, खुदा के आदेशों को नहीं पढ़ा | इसीलिए मुझे कभी भी धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने में कभी रूचि रही ही नहीं क्योंकि ये ग्रन्थ इंसानों को सही राह दिखा पाने में असमर्थ हैं, बल्कि भटकाते ही हैं सभी को | फिर एक ग्रन्थ पढ़कर कोई समझ नहीं सकता, बल्कि दुनियाभर की और कई किताबें पढनी पड़ती हैं उन्हें समझने के लिए | चलिए सारी किताबें जिन्होंने पढ़ रखीं हैं, उनके साथ बैठो तो पता चलेगा कि वे भी सभी एकमत नहीं हैं | अभी कल ही किसी ने कहा;

इस कमेन्ट के स्क्रीन शॉट से आप समझ सकते हैं कि कैसे दोनों ही पक्ष को सही साबित करने का प्रयास किया जा रहा है | इस्लाम में आँख के बदले आँख, खून के बदले खून का नियम है | किसी ने इस्लामिकों को इंसान बनाने के लिए कहानी लिख दी कि मोहम्मद साहब के सर पर कोई कूड़ा फेंकता था, तब भी वे नाराज नहीं होते थे और उन्हें माफ़ कर देते थे | लेकिन इस्लाम के समझदार विद्वानों ने समझा कि ये केवल दयालु लोगों पर लागु है, खून खराबा के शौकीन लोगों पर नहीं | इसी आधार पर आइसिस, अलकायदा खून खराबा करते फिर रहे हैं | और यही इस्लामिक समाज दूसरों को कूड़ा कचरा वाली कहानी सुना कर बरगला रहे हैं |

इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि किस प्रकार ये किताबी धार्मिकों का समाज भ्रमित रहता है | इन्हें खुद ही नहीं पता कि इनका मजहब या धर्म क्या कहता है | इन्हें खुद ही नहीं पता कि इनके अपने समाज में कितनी असमानताएँ हैं, लेकिन घमंड में अकड़े हुए हैं कि हमारा धर्म सबसे श्रेष्ठ है इसलिए हम श्रेष्ठ हैं | कई धार्मिक तो यहाँ तक कहते फिरते हैं कि एक दिन हमारा ही साम्राज्य होगा, बाकी सभी गायब हो जायेंगे | इसी भ्रम में न खुद चैन से जीते हैं और न ही दूसरों को जीने देते हैं |

मुस्लिमों के साथ तो यह समस्या थी ही कि ये जहाँ भी जाते हैं अपना शरिया लेकर चलते हैं और फिर मौका मिलते ही, दूसरों पर थोपना शुरू कर देते हैं | जैसे कि जर्मन, इंग्लेंड और अमेरिका में करते हैं | दूसरों के देश में जाकर नागरिकता लेते हैं और फिर उनको नियम कानून सिखाने लगते हैं | जो लोग खुले विचारों के हैं, जिन्हें विरासत में ही आजादी से जीना मिला है, उन्हें जाकर बुरका पहनाने लगते हैं | क्योंकि ये अपनी कामुकता पर कंट्रोल नहीं कर पाते, इसलिए लड़कियों को ढँक कर रखना पसंद करते हैं | इनके लिए जो लड़की बुरका नहीं पहनती वह नंगी होती है | बुरका के विरोध में कुछ लिख दो तो कहेंगे अपनी माँ बहनों को नंगा क्यों नहीं घुमाते ?

मैंने कभी नहीं देखा किसी भी धर्म के ईश्वर ने आकर किसी भी धर्म के लोगों को कहा हो कि तुम लोग गलत कर रहे हो | हज़ारों वर्षों पहले किताब लिख दी, दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी, लेकिन कोई संशोधन नहीं किया खुदा ने अपनी लिखी किताबों पर | जब कोई निर्दोष मारा जा रहा होता है, तो किसी भी धर्म का ईश्वर या अल्लाह नहीं आता यह कहने कि तुम गलत कर रहे हो | क्योंकि उसने किताब लिख दी और एक लेखक पास इतनी हिम्मत होती नहीं है कि उग्र भीड़ को जाकर समझाए कि मेरी लिखी किताब पढ़ो | वह जानता ही कि भीड़ के पास अक्ल नहीं होती, वह पढ़ने के चक्कर में नहीं पड़ेगी, बल्कि लेखक को ही चीर-फाड़ देगी | इसलिए खुदा भी भीड़ से खौफ खाता है | भीड़ से ही नहीं खुदा तो हर अपराधी, बलात्कारी, घोटालेबाज, रिश्वतखोर से खौफ खाता है | इसीलिए नीचे नहीं आता, बल्कि कहता है कि कयामत के दिन यानि आखिरात में सभी का हिसाब किताब कर देगा | तब तक जो कुछ करना है करते रहो | जब सबकुछ समाप्त ही हो जाएगा तब हिसाब किताब करने का लॉजिक मेरी तो समझ में नहीं आता |

यह तो कुछ वैसी ही बात हो गयी कि किसी ने कोई अपराध किया, जीवन भर वह ऐश से जीया और मरने के बाद उसे सजा सुनाई गयी | यह तो वैसी ही बात हो गयी कि किसी का घर जल गया, परिवार बर्बाद हो गया, भूख प्यास से तड़प कर मर गया और उसके बाद उन्हें मुवावजा दिया जाए |

वर्तमान में आप पायेंगे कि सभी मजहब या धर्मों की स्थिति बिलकुल एक समान है और सभी लड़ने-मरने पर अमादा हैं | सभी यही साबित करने में लगे हैं कि जो भी अच्छी व मानवीय बातें हमारे धार्मिक ग्रंथों में लिखीं हैं, वे सब केवल चारा डालकर दूसरे मजहब के लोगों को अपने दड़बे में शामिल करने के लिए हैं, न कि व्यावहारिक रूप से अपने आचरण में लाने के लिए | ये धार्मिक लोग किसी गरीब कमजोर पर तो तुरंत कूद कर खड़े हो जायेंगे इन्साफ करने के लिए, लेकिन जब पता चले कि सामने वाला कोई बड़ा नेता है, या पैसे वाला है तो यही लोग उनके तलुए चाटने लगेंगे |

सभी मानते हैं कि वे धार्मिक हैं और सभी मानते हैं कि उनका मजहब या धर्म बहुत ही मानवीय है, बहुत ही प्रेम व भाईचारे वाला है, बहुत ही इन्साफ पसंद है  | सभी मानते हैं कि उनका मजहब कहता है कि कभी गलत का साथ मत दो, कभी अत्याचारी, अन्यायी का साथ मत दो, कभी धूर्त-बेईमानों का साथ मत दो | लेकिन समझ में नहीं आता कि फिर रिश्वतखोरों को रिश्वत देता कौन हैं ? फिर अपराधी, जुमलेबाज, धूर्त, धर्म व जाति के नाम पर आपस में लड़ाने वालों को वोट देता कौन है ?

यदि बेईमानों को वोट देने वाले लोग धार्मिक नहीं हैं, तो फिर हम यह मान कर चलें कि धार्मिकों की संख्या बहुत ही कम है और वे वोट दें या न दें कोई फर्क नहीं पड़ता ?

मुझे ऐसा कोई किताबी मजहब नहीं दिखा आज तक, जिसमें धूर्त, बेईमान, बलात्कारी, हत्यारे, स्मगलर, वेश्यावृति आदि न पाया जाता हो | ऐसा कोई मजहब नहीं देखा मैंने आज तक, जिसमें गरीब, लाचार, शोषित, पीड़ित वर्ग न होता हो | लेकिन हर मजहब खुद को महान बताने में लगा हुआ है बेशर्मी से | क्योंकि इनके पास रटा-रटाया डायलॉग होता है कि जो गलत कर रहे हैं हमारे मजहब में वे खुदा की लिखी किताबें नहीं पढ़ते | कई बार फिल्मों में देखा है मैंने कि वेश्यों के कोठों में भी उनके आराध्यों की पूजा की जाती है | इसाई हुई तो क्रोस या जीसस की तस्वीर रखेगी, मुसलमान हुई तो कुरान पढ़ती मिलेगी, हिन्दू हुई तो देवी देवताओं को पुजती मिलेगी | और धार्मिक लोग भी पूरी श्रृद्धा से इनके पास जाते हैं | किसी कोठे में जाकर किसी को पकड़ लो और पूछो उसका मजहब तो कोई खुद को मुसलमान बतायेगा कोई ईसाई बताएगा, कोई हिन्दू बतायेगा |

तो सबकुछ होता है धर्म का लबादा ओढ़े, आसमानी या ईश्वरीय किताबों को पढ़ने वाले समाज में | बस ढोंग करते हैं कि हम लोग कितने शरीफ हैं | कोई व्यक्ति यदि पकड़ा गया तो सारा समाज उससे ऐसा व्यव्हार करता है जैसे कि वही अकेला पापी है, बाकि सभी शरीफ | वह चोर भी चला आता है दो हाथ जमाने पकडे गये आरोपी पर, जिसने टैक्स की चोरी की, जिसने रिश्वत देकर अपना काम निकाला, जिसने घोटालेबाज नेताओं को वोट दिया, जिसने अपराधियों, कालाबाजारियों का साथ दिया | राम-रहीम, आसाराम को लोग ऐसे उछाल रहे हैं जैसे वही अकेले कामुक हैं, और ये शराफत का लबादा ओढ़े हुए लोग कामुकता से मुक्त हो चुके हैं |

इतना दोगलापन है इन धार्मिकों के समाज में कि ऐसे समाज से ही नफरत हो गयी मुझे |

सनातन धर्म

इसीलिए मैंने किताबी धार्मिक बनने से बेहतर समझा सनातनी होना | कम से कम दोगलापन तो नहीं है सनातन में | मैं ऋषि-मुनियों के युग की कल्पना करता हूँ जैसा कि मैंने पढ़ा किताबों में, तो मुझे वे लोग इन किताबी धार्मिकों से कई गुना अधिक ईमानदार लगे | उन्होंने समाज द्वारा अस्वीकृत व घृणित मानी जानी वाली बातें भी बिना किसी भय के लिख दी | अब वे कहानियाँ सहीं हैं या गलत यह महत्वपूर्ण नहीं हैं मेरे लिए | महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने जो लिखा निःसंकोच लिखा | अजंता एलोरा, खजुराहो की मूर्तियाँ हों या वातस्यायन का कामसूत्र, सभी सिद्ध करते हैं कि वे ढोंग नहीं करते थे | वे प्रकृति व ब्रह्मचर्य के विरुद्ध नहीं थे | आज ब्रह्मचर्य का अर्थ ब्रह्मचर्य के विरुद्ध होना ही है | जो प्रकृति के विरुद्ध हो जाये वही ब्रह्मचारी माना जाता है |

अभी हाल ही में एक डॉक्टर से भेंट हुई, जो किसी कारणवश मुझसे प्रभावित थे और मेरे साथ मिलकर संस्था बनाकर ग्रामीणों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना चाहते हैं | तो मैंने उन्हें जब ब्रहमचर्य की वह परिभाषा बताई जो कि अब समाज से लुप्त हो गयी, तो उन्हें बहुत ही आश्चर्य हुआ | उन्होंने कहा कि आज पहली बार ब्रह्मचर्य की सही परिभाषा सुनने मिली और वह भी बिना किसी पाखण्ड के | एक दिन उन्होंने किसी साधू से प्रश्न किया कि वे अपनी कामुकता को कैसे शांत करते हैं | क्योंकि यह तो प्राकृतिक क्रिया है और वीर्य संग्रहण की भी एक सीमा है | उससे अधिक होगा तो नाईटफाल होगा ही | तो साधू ने बताया कि हम हस्तमैथुन से लेकर कॉल गर्ल तक सभी प्रयोग करते हैं | लेकिन सबकुछ समाज से छुपाकर क्योंकि बाहर हमें खुद को ब्रह्मचारी दिखाना होता है, तभी समाज हमारा सम्मान करता है |

जबकि मैं ऐसे झूठे सम्मान के विरुद्ध हूँ | जो समाज स्वयं नहीं कर सकता, वह साधू-संन्यासियों पर क्यों थोपता है ? और साधू-संन्यासी भी ऐसे ढोंग क्यों करते हैं ?

ऋषि मुनियों ने तो विवाह भी किये और कई कई स्त्रियों से सम्बन्ध भी बनाए | क्योंकि वे प्रकृति के विरुद्ध नहीं थे, क्योंकि वे सनातनी थे | वे ढोंग नहीं करते थे आधुनिक साधू-संतों की तरह | यह और बात है कि किसी किसी की कामुकता स्वतः ही लुप्त हो जाती है या नामर्द हो जाता है | लेकिन सभी को नामर्द होने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है ? कहीं लिंग भंग का प्रयोजन हैं तो कहीं ऐसे भोजन का कि कामुकता ही शांत न हो, बल्कि मर्द ही नामर्द बन जाये | क्योंकि धार्मिकों का समाज मानता है कि कामुकता अध्यात्म में बाधक है | यदि ऐसा है तो दुनिया के सभी नामर्द आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर होने चाहिए थे | यदि ऐसा है तो सभी अविवाहित आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर होने चाहिए थे | जबकि ऐसा होता नहीं, कोई एकाध ही होता है जिसने अध्यात्मिक ऊँचाइयों को छू लिया | और वह कोई भी हो सकता है, यानि विवाहित या अविवाहित कोई भी |

फिर हम यह भी पढ़ते हैं कि ऋषि-मुनियों को क्रोध भी आता था | दुर्वासा, परशुराम, वशिष्ट, विश्वामित्र आदि अपने क्रोध के लिए जाने जाते हैं | उन्हें जब क्रोध आता था तो बहुत प्रलयंकारी हुआ करता था | भोले कहे जाने वाले शिवशंकर को भी क्रोध आता था और क्रोध में किया ताण्डव नृत्य भी उनका जगप्रसिद्ध है  | श्री कृष्ण को भी क्रोध आया तो उन्होंने रथ का पहिया उठा लिया | वे गौतम बुद्ध या महावीर बनकर नहीं बैठ गये थे | आज गौतम बुद्ध या महावीर के अनुयाई भी क्रोध में ध्यान करने नहीं बैठेंगे, बल्कि सामने वाले का सर तोड़ने के लिए उठ खड़े होंगे |

तो सनातन धर्म छल-कपट नहीं है | कोई आडंबर या ढोंग नहीं हैं | आप जो हैं, जैसे हैं वैसे ही स्वयं को स्वीकार लेना ही सनातन धर्म हैं | दूसरों को दिखाने के लिए ढोंग या पाखण्ड करने की आवश्यकता नहीं है, जैसे कि किताबी धार्मिकों में चलन है | सनातनी न तो स्त्रियों की निंदा करता है और न ही उन्हें साधना या ध्यान में बाधक मानता है | बल्कि सनातनी उन्हें सहयोगी मानता है अध्यात्मिक यात्रा में | सनातनी पीछे नहीं लौटता बल्कि आगे ही बढ़ता है अपने श्रेष्ठ गुणों को निखारते हुए | वह तकनीकी या भौतिक जगत का विरोधी नहीं होता, बल्कि उनके साथ तारतम्यता रखते हुए आगे बढ़ता है | वह धन को हाथ का मैल नहीं कहता, बल्कि आधुनिक जगत में जीने के लिए आवश्यक अंग मानता है |

सारांश यह कि सनातन धर्म प्राकृतिक धर्म है, ईश्वर प्रदत्त धर्म है और सनातनी होने के लिए सारी जिम्मेदारी स्वयं ही लेनी पड़ती है | आपके पास कोई किताब नहीं है अपनी गलतियों को उसके पीछे छुपाने के लिए | आप गलत है, तो आपको ही भुगतना होगा और अच्छे हैं तो भी आप ही जिम्मेदार हैं | यहाँ सीधा सिद्धांत है कि यदि आप किसी का बुरा करते हैं, किसी पर अत्याचार करते हैं, किसी से विश्वासघात करते हैं, तो उसका जो भी परिणाम आयेगा वह भी आपको ही भुगतना होगा और इसी जन्म में भुगतना होगा | यदि आपने अपने किये गलत का प्रायश्चित कर लिया, यानि स्वयं ही आगे बढ़कर जिसके साथ अन्याय हुआ आपके द्वारा, उससे न केवल क्षमा माँगी, बल्कि उसे हुए हानि की भरपाई भी की तो आप मुक्त हो गये | यदि आपसे कोई गलती हो गयी और आपको सजा दी जा रही है, तो उसे सहजता से स्वीकार लेना ही सनातन धर्म है | बचने का प्रयास किताबी धार्मिक करते हैं | झूठे गवाह, झूठे वकीलों की आवश्यकता किताबी धार्मिकों को पड़ती है, सनातनी अपनी सजा स्वयं भुगतने के लिए तैयार रहता है |

तो सनातन धर्म सहज धर्म है कोई ढोंग या पाखण्ड नहीं | जबकि किताबी धर्म सिवाय दोगलापन और पाखण्ड के कुछ नहीं | यह ध्यान रहे चार अच्छे लोगों या वास्तविक संतों के आधार पर आप पूरे साधू-समाज को अच्छा नहीं कह सकते | क्योंकि चार बुरे लोगों या संतों के कारण पूरा साधू समाज बुरा नहीं हो जाता

~विशुद्ध चैतन्य

 

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