यदि आप स्वयं को नहीं जानेंगे तो यह जीवन ही व्यर्थ हो जायेगा आपका

विशुद्ध चैतन्य कौन है क्यों है, कहाँ से है…यह सब बातें महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है कि आप स्वयं कौन हैं, क्यों हैं और क्यों आये हैं दुनिया में वह जानना | मेरी चिंता छोड़ दीजिये, मुझे नहीं भी जानेंगे तो आपको कोई हानि नहीं होगी, लेकिन यदि आप स्वयं को नहीं जानेंगे तो यह जीवन ही व्यर्थ हो जायेगा आपका | हाँ मेरा उद्देश्य क्या है, वह यदि आप जानना चाहें तो आगे पढ़ सकते हैं |सोशल मिडिया हो या वेबसाइट, मैं जहाँ भी लिखता हूँ, जो भी लिखता हूँ उसका एक ही उद्देश्य होता है और वह है समाज को जागृत व आत्मावलोकन करवाना | हम सभी जो भारतवर्ष के नागरिक हैं भारतीय ही हैं | लेकिन हम केवल प्रशासकीय दस्तावेजों पर फॉर्म पर और सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्रियों में ही भारतीय रह गये | दिलोदिमाग से तो हम हिन्दू हैं, मुस्लिम हैं, वकील हैं, डॉक्टर हैं, स्त्री हैं, पुरुष हैं लेकिन भारतीय नहीं हैं और न ही इंसान हैं |

हम जन्म से न तो हिन्दू हैं और न ही डॉक्टर या इंजीनियर, हम जन्म से मानव हैं और उसके बाद भारतीय | क्योंकि जन्म के समय जो शरीर हमें मिला वह मानव का है और जिस भुमि में हमने जन्म लिया वह भारत है | भारत भी मैं केवल इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह एक ऐसा भौगोलिक परिवेश है, जहाँ विश्व की सभी जलवायु, वातावरण और रहन-सहन, खान-पान आदि पाया जाता है | जबकि दुनिया में कई देश तो किसी एक ही तरह के जलवायु, खान-पान रहन सहन में जीने को विवश हैं |

सबसे पहले हमने माँ को जाना और फिर पिता को जाना जब तक हम गोद में थे | फिर जाना पहली बार उस भूमि को जिसपर हमने चलना और खड़े होने सिखा, लेकिन तब तक हमारा परिचय नहीं हुआ था धर्म, वर्ण, जाति व सम्प्रदाय से | फिर हमने जाना सम्प्रदाय, पंथ और धर्म को जो हमें माँ-बाप और समाज ने बताया, हम अपने साथ लेकर नहीं आये थे लेकिन हमने उन्हें अपनाया | समय के साथ हम बड़े हुए और भूल गए उस भूमि को जिसने पहली बार हमें अपने आगोश में लिया बिना यह पूछे कि तुम्हारा धर्म या वर्ण क्या है | उस भूमि ने हमारे लिए अन्न उपजाए ताकि हम भूखे न रहें और वह भी बिना किसी भेद भाव के | लेकिन हमने बदले में उसे क्या दिया ?

Vishuddha Chaitanyaअपने ही देश की संस्कृति और समाज को ठुकरा कर हम विदेशी संस्कृति को महत्व देने लगे | अपने स्वयं के आस्तित्व को ठुकरा कर नेताओं की धोती पकड़ कर चलने लगे | राष्ट्र से अधिक पार्टी और नेता हमें प्रिय होने लगे | ईश्वर ने हमें जो मस्तिष्क दिया है, जो आँखें दीं हैं, जो कान दिए हैं…. हमारे मस्तिष्क में यह बात बैठाने का विचित्र प्रयास हो रहा है कि यदि हम किसी नेता विशेष या पार्टी विशेष का समर्थन नहीं करते, तो हम राष्ट्रभक्त नहीं हैं, या हिन्दू नहीं हैं, या मुस्लिम नहीं हैं | क्या कभी आपने सोचा है कि हमारी राष्ट्रीयता, हमारी पहचान किसी नेता या पार्टी की सिफारिश से नहीं मिली हैं ? हमने इस देश में जन्म लिया है, इसलिए हम हम इस देश के नागरिक हैं न कि किसी नेता या पार्टी की वजह से | हमारे लिए राष्ट्र व उसके नागरिक सर्वोपरि हैं, नेता या पार्टी नहीं |

फिर उनका कोई अधिकार भी नहीं बनता यह बताने का कि आप कौन हैं | आप अपना विवेक का प्रयोग कीजिये और आत्मावलोकन कीजिये कि आप पहले भारतीय हैं या हिन्दू हैं या मुस्लिम हैं !

मेरा उद्देश्य आपको उस वास्तविकता से परिचय करवाना है जो धर्म सम्प्रदाय से ऊपर है और वह है मानवता | समाज, नागरिकों, राष्ट्र व स्वयं के प्रति हमारा कर्त्तव्य | हिन्दू या मुस्लिम होने के लिए केवल तिलक और टोपी बहुत है, लेकिन इंसान होने के लिए भारतीय होने के लिए बहुत कुछ चाहिए | शालीनता, सौम्यता, सहृदयता, मर्यादित आचार-विचार चाहिए | और चाहिए विघटनकारी मानसिकता के व्यक्तियों व संगठनों से दूरी | और तभी हम भारतीय जो कि अब लगभग लुप्तप्राय अल्पसंख्यकों में आ चुके हैं, अपना आस्तित्व बचा पाएंगे | धर्म और मान्यताएँ सबके अपने-अपने कोई विरोध नहीं मेरा किसी से लेकिन सर्वप्रथम हम भारतीय हैं और वही हमारी पहचान है | इंसान हैं या नहीं, वह बहुत बात की बात है, पहले भारतीय तो बन जाएँ | यह भारत अन्य देशों की तरह किसी एक मत-मान्यताओं में कैद संकीर्ण मानसिकताओं वाला देश नहीं है, यह सभी को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए |

~विशुद्ध चैतन्य

 

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