पाखंडी निकल पड़ा प्रचार करने…

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मेरे पिताजी की विशेषता थी कि वे किसी पर निर्भर नहीं रहते थे और वही गुण विरासत में मुझे भी मिला | इलेक्ट्रोनिक्स से लेकर इलेक्ट्रिकल्स तक सभी स्वयं ही मरम्मत कर लेता था और किसी के लिए न सही, पर अपने लिए तो खाना बना ही सकता हूँ | अब देखिये न…. एक संयासी होते हुए भी, मुझे कितना काम करना पड़ता है !!!

पहले विषय सोचो, फिर लिखो, फिर लोगों के प्रश्नों के उत्तर दो…. चूँकि इज्ज़त खरीद नहीं सकता क्योंकि मैं कोई अम्बानी या अदानी तो हूँ नहीं, सो किसी पत्रकार से अपनी प्रशंसा के लिए कुछ लिखवा भी नहीं सकता | न ही दुमछल्लों को एफोर्ड कर सकता हूँ और न ही विज्ञापन दे सकता हूँ | इसलिए इज्जत तो अपने पास है नहीं….. ठहरिये… ठहरिये….!!! किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले पूरा पोस्ट पढ़ लीजिये |

जानता हूँ कि मेरे साथ बहुत से ब्रम्हज्ञानी, तत्वज्ञानी, प्रोफ़ेसर और लेक्चरार, प्रशानिक अधिकारीगण जुड़े हुए हैं और कई दिग्गज धर्मरक्षक, धर्मप्रचारक और राजनेता भी जुड़े हुए हैं | सभी के दिमाग में जो पहली बात आएगी वह यह, कि देखा….!!! पाखंडी निकल पड़ा प्रचार करने अपना… न शास्त्रों की समझ और न ही अंग्रेजी की | जब देखो पोस्ट पर मुँह-मियाँ मिट्ठू बना फिरता है और खुद को सन्यासी कहता है |

तो मैं यहाँ स्पष्ट कर दूं कि मैं न तो आप लोगों की वाह-वाही के लालच में कुछ लिखता हूँ और न ही लिखने का मुझे कोई पारिश्रमिक मिलता है | न ही स्वर्ग या मोक्ष के चक्कर में नहीं हूँ और न ही ईश्वर को खोजने निकला हूँ | जो आज तक जाना और समझा वही उनको समझाना व बताना चाहता हूँ, जिनको आवश्यकता है | धार्मिकों, नास्तिकों, आस्तिकों, हिन्दुओं, मुस्लिमों, पंडो-पुरोहितों, धर्म-रक्षकों, व्यापारियों, भूमाफियाओं, घोटालेबाजों, अगड़ी-पिछड़ी जातियों, चारों-वर्णों, शिया-सुन्नियों, सरकारी अधिकारियों-बाबुओं और पढ़े-लिखों को मेरी बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता इसलिए नहीं है, क्योंकि उनके काम की नहीं है | मैं जो कुछ कहता हूँ वह केवल उनके लिए ही कहता हूँ, जिन्होंने पिछले कई जन्मों से मनुर्भवः मन्त्र का जाप कर रहें हैं और चूँकि वे जानते हैं कि उन्हें मानव का शरीर मिला है, तो हिन्दू-मुस्लिम बनने के बजाय मानव बनना ही श्रेष्ठ है, इसलिए उनको मेरी बातें समझ में आ सकती हैं | लेकिन पक्का नहीं है, क्योंकि मैं अभी भी मानव बनने की प्रक्रिया में ही हूँ, सम्पूर्ण मानव तो अभी भी नहीं बन पाया | इसलिए हो सकता है कि मेरी बातें या विचार अभी इतने स्पष्ट न हों |

लेकिन चिंता नहीं है, मानवों को छोड़कर किसी को भी मेरी बातों पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं है | लेकिन जिन्हें थोड़ा भी भ्रम है कि उनमें मानवों वाले कुछ गुण बचे रह गए या अंतरात्मा जोर दे रही है कि मानव बनो तो वे अवश्य मेरे विचारों पर अपनी सहमती और असहमति व्यक्त कर सकते हैं |

Vishuddha Chaitanyaलेकिन मेरे विचार आप सभी तक पहुंचेंगे कैसे यदि मैं मौन में चला गया तो ? आप लोग मुझे ढूँढ ही कैसे पायेंगे ? ब्रम्हज्ञानी को ढूँढना आसान है, तत्वज्ञानी को ढूँढना आसान है, संतों-महंतों को ढूँढना भी आसान है, लेकिन अज्ञानी को ढूँढना… वह भी मेरे जैसे जिसे अंग्रेजी भी नहीं आती… बहुत मुश्किल है |

इसलिए मैंने वेब पेज बनाया सोशल मिडिया में अकाउंट खोला…और सबसे बड़ी बात यह कि इन सारे कामों को मुझे स्वयं करना पड़ता है | चाहे, विडियो बनाना हो, चाहे स्लाइड शो बनाना हो, चाहे वेबपेज डिजाइन करना हो, चाहे म्युज़िक चुनना हो…..इसके अलावा वे सारे काम जिसे करने के लिए दुमछल्ले रखने पड़ते हैं… जैसे अपनी तारीफ़ करवानी हो, अपना प्रचार करवाना हो, फेसबुक में गाली-गलौज करने वालों से निपटना हो….

सोचिये कितना काम करना पड़ता है मुझे, केवल यह समझाने के लिए कि हमारा जन्म हिन्दू-मुस्लिम, भाजपाई-कांग्रेसी बनने के लिए नहीं, मानव बनने के लिए हुआ है | हमारा जन्म हुआ है आपस में सहयोगी होने के लिए | लेकिन आप लोग तो ज्ञानी और धार्मिक लोग हैं और धर्म-रक्षा के कार्यों में लगे हुए हैं अच्छी तरह से जानते हैं कि यह जगत तो मिथ्या है | केवल नेता, सत्ता और रुपया ही सत्य है, इसलिए मेरी बातें आप लोगों के लिए बकवास ही होंगी |

चलिए ईश्वर आप सभी का भला करें यही प्रार्थना है मेरी लेकिन खुश हूँ कि मेरी मेहनत रंग लायी और सात अरब की जनसँख्या में कुछ लोग तो ऐसे निकले जिनको मेरे विचार पढ़ने-समझने लायक लगती हैं | मुझे पक्का विश्वास है कि वे भी मेरी ही तरह अनपढ़ ही होंगे |

इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि यदि अपराधियों और मानवता के शत्रुओं के समर्थकों की संख्या सर्वाधिक है, तब भी हम मानवता वादी अल्पसंख्यक होते हुए भी किसी प्रकार अपना आस्तित्व तो बचाए हुए हैं | चाहे हम किसी क्षेत्र में विशेषज्ञ नहीं हैं, चाहे हम आज कोई भी आर्थिक या शारीरिक योगदान दे पाने में असमर्थ हों, लेकिन मानसिक रूप से हर किसी की सहायता करने के लिए तैयार रहते है | हम किसी की सहायता करते समय कभी जाति या धर्म नहीं पूछते और यदि पूछते भी हैं तो केवल इसलिए ताकि उसकी धार्मिक भावनाओं का ध्यान रखा जा सके | आज हमारी प्रजाति लुप्त होने के कागार में हैं, लेकिन जिस दिन हम लुप्त हो गये, उस दिन प्रलय आ जाएगा | क्योंकि सभी धार्मिक और विद्वान लोग आपस में ही लड़ मरेंगे धर्म, जाति और सत्ता के नाम पर | -विशुद्ध चैतन्य

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