जिसने सत्य को जाना, वह मौन हो गया




अक्सर लोग कहते हैं कि जिसने सत्य को जाना, वह मौन हो गया |
 
सही कहते हैं क्योंकि सत्य को जानने के बाद सिवाय मौन हो जाने के और कोई उपाय नहीं है | क्योंकि दुनिया में हर कोई विद्वान है और विद्वान लोग सत्य से उतना ही परहेज करते हैं, जितना कि राजनेता और धर्मों के ठेकेदार साम्प्रदायिक सौहार्द से परहेज करते हैं |
 
बचपन में अक्सर सोचा करता था जब माँ मुझे महाभारत या रामायण की कहानी सुनाया करती थी कि जब सतयुग, द्वापर युग देवताओं का युग था तब भी अधर्म और अधर्मी क्यों थे ? तब भी अत्याचार, शोषण और गरीबी क्यों थी ?
 
उस समय तो देवता जमीन पर वैसे ही चलते फिरते थे, जैसे कि आज हम सभी चलते फिरते हैं | यह और बात है कि आजकल देवी-देवता मंदिरों में कैद होकर रह गये क्योंकि बाहर घूमते कहीं पकडे गये तो मंदिर-मस्जिद और धर्मों के ठेकेदार ही और उनके सड़कछाप दुमछल्ले ही मार-पीट कर जिन्दा जला देंगे |
 
तो उस समय तो उनको कोई खतरा नहीं था, चैन से घूमते थे सभी से मिलते थे | जो उनकी स्तुति करता, चापलूसी करता तुरंत प्रकट हो जाया करते थे और कहते थे, “हम प्रसन्न हुए, वर माँगों बच्चा ??”
 
फिर भी उस समय दरिद्रता थी ?
 
उस समय भी कोई किसी की स्त्री उठाकर ले जाता था तो कोई किसी का चीर हरण ही करने लगता था | वह भी तब जब भगवन स्वयं जमीन पर घूम रहे हों ?
 
कई बार माँ से भी प्रश्न किया लेकिन उनका जवाब उन्हीं की तरह मासूम हुआ करता था | कहतीं थीं कि जब कोई ईश्वर भी मानव रूप में आये तो उसे मानवों की तरह ही रहना होता है | उसके पास शक्तियां होते हुए भी उसे साधारण बनकर ही रहना होता है |
 
खैर मेरी बुद्धि इतनी थी नहीं कि ऐसे मासूम उत्तर को आसानी से हजम कर पाए तो फिर बहस ही नहीं करता था | लेकिन जब कई पंडितों से भी प्रश्न करने के बाद मुझे उत्तर नहीं मिला तो फिर यही समझ में आया कि वे लोग शायद उत्तर नहीं जानते |
 
बरसों भटकने के बाद, दुनिया भर की ठोकरें खाने के बाद जो उत्तर मुझे मेरी ही आत्मा ने दिया यानि भीतर से ही जो उत्तर मिला वह यह कि अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, आदि जितने भी आचार हैं, वे सनातन हैं | बिलकुल वैसे ही जैसे रात, अँधेरा | जहाँ दिन होगा वहां रात भी होता और कहीं न कहीं अँधेरा भी छुपा बैठा रहेगा | जहाँ दिन कमजोर हुआ और रात्रि बलशाली होने लगती है | इसलिए देवता रहें या न रहें अत्याचारी, भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज रहेंगे ही और दुनिया उनके सामने घुटने टेकने के लिए विवश रहेगी ही | क्योंकि दुनिया भेड़ों की भीड़ से अधिक और कुछ नहीं होती | इसमें जो खुद को बहादुर शेर भी समझता होगा, वह भी किसी कमजोर बुजुर्ग जो जंगल में बुलाकर पीछे कुदाल मारकर अधमरा कर देता है और फिर उसपर पेट्रोल डालकर आग लगा देता है | ये भीड़ में छुपे बहादुर लोग कभी किसी सशस्त्र आतंकी को ललकार कर सामने से लड़ने का साहस नहीं कर पाते | ये केवल कमजोर, असहाय, निहत्थे शिकार खोजते हैं और फिर उसे मारकर शेरखान कहलाते हैं |
 
और ऐसे जाँबाज गीदड़ों के शेरों से डरती फिरती है दुनिया | ये गीदड़ आतंकी कहलाते हैं और हज़ारों की भीड़ इन दो चार गीदड़ों से डरकर अपने अपने बिलों में दुबक जाते हैं | लाख समझाओ कि अपने अपने समाज में छुपे ऐसे विकृत मानसिकता के लोगों को सही मार्ग दिखाओ, अपनी अपनी आसमानी किताबें पढ़वाओ, जमजम या गंगाजल पिलाओ यह गंगाजल से ही नहलाओ, लेकिन इनको सही राह दिखाओ | लेकिन विद्वान और धार्मिक लोग हमें किताबें पढ़ाने चले आते हैं | हमने कभी चींटी भी नहीं मारी लेकिन ये हमें किताब पढ़ाने चले आते हैं | हमे समझाने लगते हैं कि धर्म क्या है आसमानी किताबें क्या कहतीं हैं | लेकिन जो कत्ल-ए-आम करते हैं, जनता के पैसों पर कुंडली मारे बैठे रहते हैं, देश का धन विदेशों में जमा करते हैं….उन्हें ये लोग कुछ नहीं कहेंगे | उलटे उनकी जय जयकार करेंगे |
 
यही है वह सत्य जिसे जानने के बाद गौतम बुद्ध ने भी मौन धारण कर लिया था | क्योंकि वे समझ चुके थे कि समझाने का कोई लाभ नहीं | क्योंकि जब देवताओं के युग में रामायण का युद्ध नहीं रुक सका, महाभारत का युद्द नहीं रुक सका तो फिर किसी को समझाने का क्या लाभ |
 
तो सत्य समझ जाने वाले लोग मौन हो जाते हैं और उन्हें कहना ही पड़ता है कि हर कोई अपनी नियति साथ लेकर आया है | कितना ही समझाओ, मरेगा अपनी ही मौत | इसी प्रकार हम सब देखते हैं जानते हैं कि धर्म और राजनीति के ठेकेदार कैसे जनता को गुमराह करके आपस में ही लडवा रहे हैं | लेकिन फिर भी हम उनके तलुए चाटने के लिए विवश हैं | क्योंकि गीदड़ों के शेर असली शेर से अधिक खतरनाक होते हैं | वे प्रेम बुलाकार अपने ही स्कूटर में बैठाकर जंगल ले जाते हैं और फिर पीछे से कुदाल मारकर अधमरा कर देते हैं और फिर जिन्दा जला देते हैं |
 
~विशुद्ध चैतन्य



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