असली भगवान कौन है यह तो विदेशियों ने हमें सिखाया

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बात कई हज़ार साल पुरानी है | उन दिनों लोग इतने अशिक्षित होते थे कि अंग्रेजी लिखना तो दूर, बोलना भी नहीं जानते थे | यहाँ तक कि किसी ने नाम तक नहीं सुना था | यह तो भला हो कान्वेंट एजुकेशन और पब्लिक स्कूल वालों का कि आज भारतीय शिक्षित व पढ़े लिखे हैं | अंग्रेजी में बात कर लेते हैं |

अब चूँकि लोग अशिक्षित थे अनपढ़ थे तो उन्हें क्या पता कि GOD किसे कहते हैं ? वे लोग तो प्रकृति को ही भगवान मान रहे थे | वे लोग गाय बैलों की पूजा करते थे क्योंकि उन्हें बताया गया था कि इनकी पूजा सेवा से समृद्धि आती है, जीवन सुखमय होता है | उनके पूर्वजो ने उन्हें यह सब इसलिए बताया था क्योंकि लोग कान्वेंट एजुकेटेड नहीं थे | लेकिन उस समय हमारे देश में संस्कार था बड़ों की आज्ञा का पालन करने का | तो उन्होंने अपने पूर्वजों के आज्ञा का सम्मान किया और पशुओं को पूजने लगे | इससे हर घर में गाय बैल रखने की प्रथा चल पड़ी और उनके घर में ये पशु परिवारक सदस्यों की तरह रहते और घर के काम काज में हाथ बटाते, जैसे बैल खेत में दिन भर मेहनत करता तो गाय दूध और घी आदि उपलब्ध करवाती | चूँकि दोनों ही पूजनीय थे इसलिए उनके स्वास्थ्य का विशेष ध्यान भी रखा जाता था | इससे लोगों की खेतों में हरियाली रहती और घर में स्वास्थ्य व समृद्धि | लेकिन आज सब पढ़े लिखे और अंग्रेजी बोलने वाले हो गए हैं, इसलिए गायें सड़कों बाजारों में लावारिस घूमती नजर आती हैं | अब सब जानते हैं कि गायें पूजनीय नहीं हैं GOD तो कोई और है |

इसी तरह सूर्य और चन्द्रमा को भगवान बता दिया उन गँवार नॉन कान्वेंट एजुकेटेड पूर्वजों ने | कहते थे कि सूर्य देव अपने रथ में सवार होकर सुबह सुबह निकलते हैं और जो उनके आने से पहले नित्यकर्म, स्नान आदि से निवृत होकर उनका स्वागत नहीं करता उनके घर मे तरह तरह की बीमारियाँ व विपत्तियाँ आती हैं | उस समय के डॉक्टर अंग्रेजी नहीं जानते थे, तो जब तक अंग्रेजी बोलने वाला डॉक्टर नहीं आ जाता तब तक कोई बीमार भी नहीं पड़ना चाहता था | तो लोग डर के कारण सुबह जल्दी उठ कर नहा धो लेते थे | चूँकि सुबह का वातावरण शुद्ध होता था इसलिए उनका मन प्रसन्न और शरीर स्वस्थ रहता था | शाम को चंद्रमा के प्रकाश में टहलने से शरीर नकारात्मक उर्जा से मुक्त हो जाता था तो नींद भी अच्छी आती थी | | लेकिन अब लोग शिक्षित हो गए हैं और जानते हैं कि सूर्य देव के पास कोई रथ नहीं है और न ही कोई घोडा है | वे भगवान भी नहीं हैं क्योंकि भगवान तो कोई और है | और फिर अब पैसा भी है तो महंगे से महंगे डॉक्टर से इलाज करवाया जा सकता है, सुबह सुबह सूर्यनमस्कार करने जैसा गँवारों वाला काम क्यों करें ? आखिर कान्वेंट एजुकेटेड हैं और अंगेजी बोलते हैं हम !

असली भगवान कौन है यह तो विदेशियों ने हमें सिखाया | जब भारत में विदेशी आये, अपने अपने भगवानों के साथ तब भारतीयों को समझ में आया कि हम लोग कितने पिछड़े हुए हैं | हमने जाना कि प्रकृति की पूजा अशिक्षित लोग करते हैं, कान्वेंट एजुकेटेड लोग तो मानवों की पूजा करते हैं | तो हमने ब्रम्हा, विष्णु, महेश, प्रकृति और पशुओं की पूजा रस्मी पूजा के रूप में स्वीकार लिया और विदेशियों की नक़ल करके अवतारों की पूजा शुरू कर दिया | अब यह बहुत ही सुविधा जनक हो गया क्योंकि सूर्यदेव के स्वागत के लिए अब सुबह सुबह उठ कर नहाना नहीं पड़ता था और अवतारों की पूजा तो कभी भी कहीं भी की जा सकती है | तो लोगों ने अपने अपने सुविधानुसार अपने अपने भगवान बना लिए | कई लोगों ने तो अवतारों के चक्कर में न पड़कर पायलट बाबा, लेपटॉप बाबा, कंप्यूटर बाबा, गोल्डन बाबा जैसे अत्याधुनिक बाबाओं को ही पूजना शुरू कर दिया | धर्म के व्यापारियों ने भी अपना धर्म निभाया और लोगों के सुविधा के लिए सड़क के किनारे ही भगवानों को खड़ा करना शुरू कर दिया क्योंकि लोगों के पास समय नहीं है, उन्हें नौकरी करनी है, बच्चे पालने है, पैसे कमाने हैं | क्योंकि अब लोग पढ़े लिखे हो गए हैं अंग्रेजी बोलते हैं | तो सड़क किनारे या चौराहों में खड़े भगवानों को चलती गाडी से ही सिक्का उछालकर, नमस्कार करके अपना दिन शुभ बना लेते हैं | फिर अब तो इंडिया डिजिटल हो गया है और लोग ऑनलाइन तीर्थों आदि में हो रहे पूजा में भाग ले सकते हैं, चढ़ावा, कमीशन या रिश्वत चढ़ा सकते हैं अपने अपने भगवानों को |


~विशुद्ध चैतन्य

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